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हीमोग्लोबिन कम या अधिक तो नहीं?

हीमोग्लोबिन कम या अधिक तो नहीं?

हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो तो भी दिक्कत और अधिक हो तब भी समस्या। यह आपकी सेहत के लिहाज़ से तो परेशानियां खड़ी करेगा ही, साथ ही जब किसी रोगी को रक्त की आवश्यकता होगी, तब भी आप सहायता नहीं कर सकेंगे। जानिए हीमोग्लोबिन के बारे में वह सबकुछ, जिससे इसका स्तर संतुलित रखा जा सके।

Credit :- डॉ. यश जवेरी निदेशक, सीसीएम व इमरजेंसी मेडिसिन, रीजेंसी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, लखनऊ

आधी रात को आरुषि दुर्घटना का शिकार हुई थी, आंतरिक रक्तस्राव काफी हो चुका था। उसे रक्त की तत्काल जरूरत थी। उसी की सहेलियों में तीन का ब्लड ग्रुप उससे मिलता हुआ ए पॉजिटिव निकला। मौके पर पहुंचने के बावजूद उसे कोई रक्त नहीं दे सकी। जांचने पर तीनों का हीमोग्लोबिन कम निकला। आरुषि अब इस दुनिया में नहीं है। हीमोग्लोबिन स्तर के कम होने का अर्थ जहां स्वयं के अस्वस्थ होने का तो संकेत देता ही है, साथ ही किसी अन्य की मदद के लिए भी आपको अनुपलब्ध बता देता है।

26 वर्षीय राकेश को लगता था कि वह पूरी तरह स्वस्थ है। शरीर से अधिक पसीना बहने को वह सामान्य मानता था। उसका हीमोग्लोबिन अधिक है, यह बात उसे तब जाकर पता चली जब एक दिन वह भीड़ में चक्कर खाकर गिरा और बेहोश हो गया। एक अजनबी द्वारा उसे अस्पताल ले जाया गया और वहां डॉक्टरों ने बताया कि यह उसकी अस्वस्थ जीवनशैली का परिणाम है।

कितना होगा सामान्य स्तर ?

हीमोग्लोबिन हमारी लाल रक्त कोशिकाओं का मुख्य हिस्सा है। हीमोग्लोबिन ग्लोबिन नामक प्रोटीन और हीम नामक यौगिक बना है। हीम में आयरन और पोर्फ़िरीन नामक पिगमेंट होता है. जिससे खून को लाल रंग मिलता है।

यह हमारे शरीर में रक्त के माध्यम से ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड ले जाता है। बेहतर स्वास्थ्य के लिए इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, अन्यथा महंगे नतीजे देखने को मिल सकते हैं। जब भी आप खून की जांच करवाएंगे तो देखेंगे कि हीमोग्लोबिन को ग्राम प्रति डेसीलीटर में मापा जाता है। सामान्य हीमोग्लोबिन पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के लिए अलग-अलग है।

ये हैं हीमोग्लोबिन के अनुमानित सामान्य स्तर

- महिलाओं के लिए 12 से 16 ग्राम प्रति डेसीलीटर 
- पुरुषों के लिए 14 से 174 ग्राम प्रति डेसीलीटर 
- गर्भवती महिलाओं के लिए 10 से 14 ग्राम प्रति डेसीलीटर

बच्चों के लिए-
- नवजात 14-24 ग्राम प्रति डेसीलीटर 02 सप्ताह 12-20 ग्राम प्रति डेसीलीटर
- 2-6 महीने 10-17 ग्राम प्रति डेसीलीटर
- 6 महीने - 6 वर्ष 9.5-14 ग्राम प्रति डेसीलीटर 
-6-18 वर्ष 10-15.5 ग्राम प्रति डेसीलीटर

कमी के कारण हैं कई

यदि आपके हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत कम है, तो सम्भव है कि आपके शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति सही तरह से न हो रही हो। यह स्थिति पुरुषों की तुलना मे महिलाओं के साथ अधिक होती है। यदि किसी व्यक्ति के हीमोग्लोबिन का स्तर पांच ग्राम प्रति डेसीलीटर से नीचे चला जाता है तो हृदय गति रुकने तक की स्थिति निर्मित हो सकती है। आमतौर पर शरीर में उचित मात्रा में प्रोटीन न होने पर यह समस्या खड़ी होती है।

गर्भवती महिलाओं का हीमोग्लोबिन सामान्यतः कम ही होता है। इसके अलावा कैंसर, लिम्फोमा, एड्स, सिरोसिस, बवासीर, आनुवंशिक असामान्यता, पीरियड्स में अधिक रक्तस्राव, मूत्राशय व धाव से रक्त निकलना, लौह तत्व की कमी, पेट के अल्सर, हायपोॉयराइडिज्म आदि होने पर भी शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो जाता है।

ऐसे दिखते हैं लक्षण

हीमोग्लोबिन की कमी के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है आगे चलकर ये बड़ी समस्या खड़ी कर देते हैं सिर में दर्द, सांस का फूलना, कमजोरी, चिड़चिड़ापन व थकान महसूस होना, हाथ-पैर ठंडे पड़ना हीमोग्लोबिन की कमी को इंगित करते हैं।

यदि ये लक्षण आपके शरीर में बने हुए हैं तो ज़रूरत है कि आप चिकित्सक को दिखाएं। चिकित्सक सबसे पहले आपकी सामान्य जांच करेंगे, पिछली बीमारी का इतिहास, शराब की लत जैसे कुछ आवश्यक सवाल पूछेंगे उसके बाद आपके रक्त की जांच की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर पूर्ण ब्लड काउंट, विटामिन बी- 112, बी-9, रक्त में लौह तत्व की कमी व पेशाब की जांच करवाने का परामर्श भी चिकित्सक दे सकते हैं। जांच में यदि स्पष्ट हो जाता है कि आपके शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम है तब चिकित्सक उपचार शुरू करते हैं जिसमें विटामिन और आयरन सम्बंधी दवाइया व इंजेक्शन दिए जाते हैं। साथ ही रोगी को दिनचर्या सुधारने व आहार में पोषण बढ़ाने की सलाह भी दी जाती है।

यदि लगातार आपका हीमोग्लोबिन कम हो रहा है तो सम्भव है कि कम समय में आप अधिक गम्भीर लक्षणों का अनुभव करेंगे जैसे कि पीलिया, बुखार, हड्डियों में दर्द, जरा-सी चोट में फ्रैक्चर आदि।

हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए आपको अपने आहार व जीवनशैली पर काम करना होगा। अधिक से अधिक हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करें। इनसे शरीर में लोहे की पूर्ति होगी। साथ ही फॉलिक एसिड, विटामिन ए. के और सी जैसे पोषक तत्वों से रक्त कोशिकाएं स्वस्थ रहेंगी।

*  गाजर, चुकंदर व किशमिश का नियमित रूप से सेवन करें।

* चाय, कॉफी, कोल्डड्रिंक्स व शराब के सेवन से परहेज करें।

* प्रतिदिन आधा घटा पैदल चलें या व्यायाम करें।

महिलाएं और बच्चे प्रभावित

हीमोग्लोबिन का स्तर अति में कम होने पर मरीज एनीमिया ग्रस्त हो जाता है। यह एक गम्भीर वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है जो विशेष रूप से छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को प्रभावित करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है। कि दुनियाभर में 5 साल से कम उम्र के 42% बच्चे और 40% गर्भवती महिलाएं एनीमिक है। भारतीय महिलाओं में रक्ताल्पता के मामले और भी अधिक है, लगभग 50% महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर कम है।

भारत में किए गए कई अध्ययनों में पाया गया कि खानपान की गलत आदतें पर्याप्त फल, विटामिन सी, और फलियां जैसे कि बीन्स और मटर नहीं खाना) और सेहत के प्रति जागरुक न रहना, महिलाओं के बीच एनीमिया का मुख्य कारण है। एनीमिया का निदान करना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि शुरुआती चरणों में कोई खास लक्षण महसूस नहीं होते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि एनीमिया से ग्रस्त 50% से अधिक लोगों को पता नहीं है कि उन्हें एनीमिया है कई स्थितियों में गुर्दे की बीमारी भी आगे चलकर एनीमिया का कारण बनती है।

बच्चों में ऐसे पता लगाएं

बच्चों में हीमोग्लोबिन यदि कम है तो उनके नाखून व होंठो को देखकर इस बात का पता लग सकता है। उनके नाखून व होठों में सफेदपन दिखाई देगा आंखों की भीतरी त्वचा का रंग भी सफ़ेद होगा। चेहरे पर हल्का पीलापन व फीकापन दिखाई देगा। खेल के दौरान वे अन्य बच्चों की तुलना में अधिक थका हुआ महसूस करेंगे। बच्चों में हीमोग्लोबिन स्तर के सुधार के लिए प्रतिदिन उन्हें सेब खिलाएं। यदि वे सेव नहीं खाते हैं तो इसका रस निकालकर पिलाएं। टमाटर खाने को दें या घर का बना हुआ टमाटर सूप दें रातभर दो मुनक्कों को पानी में गलाकर रखें और सुबह इसी पानी को छानकर बच्चे (सात वर्ष से ऊपर) को पीने दें। केला, खजूर व अनार खाने को दें। यदि बच्चा नियमित रूप से इन चीजों का सेवन करेगा तो जल्द ही हीमोग्लोबिन का स्तर संतुलित हो जाएगा।

मस्तिष्क पर पड़ सकता है असर

यद्यपि बिना किसी लक्षण के भी आपका हीमोग्लोबिन बढ़ा हुआ हो सकता है, लेकिन कुछ सामान्य संकेत हैं जो आप अनुभव कर सकते हैं। चक्कर आना, साधारण चोट पर अधिक खून बहना, अधिक पसीना, थकान, सिरदर्द और वजन घटना सामान्य लक्षण हैं। हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ जाने पर कई बार दिमागी क्षमता भी प्रभावित होने लगती है। इससे सोचने-समझने मैं मुश्किल आती है।

पेट भरा हुआ लगना व पेट में बार-बार बाईं तरफ दर्द का उठना, आंखों से धुंधला दिखाई देना व सिर में हमेशा हल्का दर्द बना रहना भी बढ़े हुए हीमोग्लोबिन के लक्षण हो सकते हैं। बढ़े हुए हीमोग्लोबिन का चिकित्सक अलग-अलग ढंग से उपचार करते हैं। कुछ मामलों में चिकित्सक फ्लेबोटोमी की सलाह दे सकते हैं। फ्लेबोटोमी में आपकी नस में सुई डाली जाती है। और अतिरिक्त लाल रक्त कोशिकाओं को हटाया आता है। जब तक आपके हीमोग्लोबिन का स्तर एक विशिष्ट सीमा के भीतर न हो जाए, तब तक आपको फ्लेबोटोमी की आवश्यकता हो सकती है।

उच्च स्तर, बढ़ता ख़तरा

हीमोग्लोबिन तब बढ़ता है जब आपकी लाल रक्त कोशिकाओं में रक्त प्रोटीन की असामान्य रूप से उच्च मात्रा होती है। हीमोग्लोबिन का उच्च स्तर पॉलीसिमिया नामक एक दुर्लभ रक्त विकार का संकेत दे सकता है। पॉलीसिमिया में शरीर बहुत अधिक लाल रक्त कोशिकाओं को बनाता है, जिससे रक्त सामान्य से अधिक मोटा हो जाता है। इससे थक्के, दिल का दौरा और स्ट्रोक हो सकता है। निर्जलीकरण, धूम्रपान व अधिक ऊंचाई पर रहने से भी हीमोग्लोबिन बढ़ सकता है। यह फेफड़े या हृदय रोग जैसी अन्य स्थितियों का भी संकेत देता है। बढ़ा हुआ हीमोग्लोबिन रक्त को गाढ़ा बनाता है जो कि रक्त रक्त वाहिकाओं और अंगों के माध्यम से यात्रा करने में कम सक्षम होता है। इसके कई लक्षण रक्त के सुस्त प्रवाह के कारण ही होते हैं।



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