घर से दूरी कभी होती है ज़रूरी
बच्चा जब तक घर में रहता है वह कम्फर्ट जोन में होता है। हर तनाव, हर निबाह से आजाद। न ख़ास दिनचर्या का दबाव, न कोई जवाबदेही ।
हर अभिभावक उसे अनुशासित जीवन जीने के लिए प्रेरित करना चाहता है।
इसीलिए हर बच्चे का एक बार किसी हॉस्टल में या स्वतंत्र रूप से रहना बहुत जरूरी है। इससे बच्चे में न सिर्फ मानसिक बल्कि सामाजिक समझ भी विकसित होती है।
जब बड़े होगे, तब जानोगे बच्चों की लापरवाही भरी जीवनशैली देखकर अक्सर अभिभावक यह कहते हैं। बच्चे हंसकर टाल देते हैं। वैसे कहना यह चाहिए कि जब अपने दम पर रहोगे, तब जानोगे। यह सिखाने के लिए जरूरी है कि बच्चा स्कूल या कॉलेज की पढ़ाई के कुछ साल छात्रावास या स्वतंत्र रूप से रहकर गुजारे। जिंदगी 360 डिग्री पर बदल जाती है, जब वह किसी दूसरे शहर में पढ़ने के लिए जाता है। जहां उसके लिए सबकुछ नया होता है। खुद से दोस्त बनाना हो या सीमित पैसों में खर्च चलाना, उसे सबकुछ सीखना और करना होता है। एक तरफ घर छोड़कर, किसी बड़े शहर में रहना, अच्छे कॉलेज या स्कूल में पढ़ने के लिहाज से जरूरी है वहीं बच्चे के व्यक्तित्व विकास के लिए भी, क्योंकि इससे वह भविष्य में आने वाली समस्याओं से लड़ने की सूझ-बदर विकसित कर पाता है।
मिल- बांटकर काम करना
मम्मी प्लीज आप कर लो, न ये वाक्य घर में अक्सर हर बच्चा बोलता है पर हॉस्टल में रहने पर उसके हिस्से का काम उसे स्वयं ही करना पड़ता है, उसके हिस्से का काम कोई और नहीं करता जिससे बच्च अनुशासन में रहना सीखता है। इसके अलावा किराए से किसी के साथ रहने पर उसे साथी के साथ मिलकर काम बांटना होगा जिससे वह साथ मिलकर काम करना सीखेगा।
आपसी संबंध स्थापित करना
घर से दूर अपने सुख-दुख बांटने के लिए कोई नहीं होता। ऐसे में बच्चा कुछ लोगों का चयन करता है। इन लोगों को चुनने के लिए वह उनकी आदतों, उनकी जीवनशैली और व्यवहार पर और करता है और जांच-परखकर दोस्त बनाता है। इससे बच्चे में लोगों की समझ विकसित होती है।
घर का स्वाद बनाना
अक्सर बाहर रहने वाले लोग एक वाक्य बोलते हैं कि ये खाना घर जैसा स्वादिष्ट नहीं है। ऐसे में ज्यादातर लोग उस खाने के स्वाद को पाने के लिए घर पर या तो फोन करके या घर पर पूछकर उस खाने को बनाने की कोशिश करते हैं। इससे होता ये है कि वह सेहत और स्वाद के बीच तालमेल बिठाना सीख जाएगा। कहते हैं कि तैरने और साइकल चलाने की ही तरह खाना बनाना सीख जाना स्वतंत्र रहने के लिए बहुत जरूरी है। यह आत्मनिर्भरता के लिए अत्यावश्यक है।
दूरी केवल मीलों की हो...
माता-पिता का मार्गदर्शन बच्चों के पास हमेशा मौजूद रहना चाहिए। बच्चे को बाहर भेजने के बाद उसे ताना मारते न रहें कि अब आटे दाल के भाव मालूम हुए? बच्चे को
समझदारी लेने भेजा है, तो उसमें उसकी मदद करें। • रोज निश्चित समय पर उससे बात करें। समय- समय पर उससे मिलने जाएं। आस-पड़ोस या हॉस्टल के दोस्तों से भी बात करते रहें। बच्चे से वीडियो कॉल करके उसके माहौल को समझते रहें हफ्ते में कम से कम से दो बार बच्चे से लम्बी बात करें ताकि उसकी मनःस्थिति जान पाएं। अगर वह उदास या परेशान लगे, तो उसे समझे और समझाकर मदद करें।
खुद की देखभाल कर मज़बूत बनना
घर पर यदि बच्चा बीमार हो जाए तो परिवार के लोग तुरंत डॉक्टर के पास लेकर जाते हैं, उसे कोई काम नहीं करने दिया जाता और सिर्फ आराम करने को कहा जाता है। यदि यही उसके साथ तब हो जब वह घर पर न होकर बाहर रह रहा हो तब उसे अपना खयाल ख़ुद रखना होगा और वो भी बिना लापरवाही के खान-पान का ध्यान रखकर और समय पर दवाई लेकर इससे वह बीमार होने पर बीमारी से लड़ने के लिए खुद को मजबूत बनाएगा और वह दोबारा बीमार न हो इसका भी खयाल रखेगा क्योंकि इस बार उसके लिए खाना बनाकर कोई उसके बिस्तर पर देने नहीं आएगा।
बजट बनाकर खर्च और बचत करना
किसी भी काम को करने से पहले उसका बजट बनाना बहुत जरूरी होता है। ऐसे में घर से दूर रहने पर अनावश्यक खर्च करना कम कर देता है। इसके साथ ही पैसों का सही प्रयोग करना सीखता है क्योंकि बाहर रहने पर उसे अपने पास मौजूद पैसों से ही खर्च और लाइफस्टाइल को मैनेज करना होगा। इससे वह धीरे-धीरे अपनी जरूरतों को पहचानने लगता है।
सामंजस्य बिठाना
घर में सबकुछ बच्चे को पसंद के अनुसार किया जाता है। पर हॉस्टल में किसी एक की पसंद के हिसाब से काम नहीं होता। ऐसे में बच्चा परिस्थिति के अनुसार सामंजस्य बिठाना शुरू कर देता है। इससे वो सीखता है कि सब अहम हैं, केवल वह नहीं तब उसे दूसरों के साथ तालमेल बैठाना आएगा।
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